जड़ी-बूटियाँ और आहार45 मिनट
देसी घी: घर पर बनाएँ और सही मात्रा में आनंद लें
घी आयुर्वेदिक खाना पकाने और उपचार के केंद्र में है — तड़के में, जड़ी-बूटियों के अनुपान के रूप में, मालिश में और रूखी त्वचा व होंठों के लिए। मलाई से घर का बना घी आसान और ख़ुशबूदार होता है। कुंजी है संतुलन: ज़्यादातर लोगों के लिए रोज़ एक-दो छोटे चम्मच ठीक हैं, कलछी भर-भरकर नहीं।

आयुर्वेद की दृष्टि से
आयुर्वेद गो-घृत (गाय का घी) को सभी वसाओं में श्रेष्ठ मानता है: मीठा, ठंडा, पोषक, पित्त बढ़ाए बिना पाचन को जगाने वाला, और याददाश्त, आवाज़, आँखों और त्वचा का साथ देने वाला। यह पारंपरिक अनुपान भी है जो जड़ी-बूटियों को धातुओं तक पहुँचाने में मदद करता है। पोषण की दृष्टि से घी ज़्यादातर सैचुरेटेड फ़ैट है, इसलिए आधुनिक सलाह संयम की है — ख़ासकर दिल की बीमारी या ऊँचे कोलेस्ट्रॉल वालों के लिए — जबकि तेज़ आँच वाले भारतीय खाने के लिए यह स्वादिष्ट, स्थिर वसा बना रहता है।
सामग्री
- मलाई (उबले दूध से उतारी), 1–2 हफ़्ते फ्रिज या फ़्रीज़र में इकट्ठी की हुई (लगभग 2 कप)
- 2 बड़े चम्मच दही
- पानी
बनाने की विधि
- मलाई को कमरे के तापमान पर लाएँ, दही मिलाएँ और जमने के लिए 6–8 घंटे छोड़ दें।
- हैंड ब्लेंडर या मथानी से ठंडा पानी डालते हुए तब तक मथें जब तक मक्खन अलग न हो जाए। मक्खन निकालकर धो लें।
- भारी कड़ाही में धीमी आँच पर मक्खन को बीच-बीच में चलाते हुए 15–20 मिनट गरम करें, जब तक घी साफ़ सुनहरा न हो जाए और नीचे का हिस्सा हल्का भूरा न हो जाए। चाहें तो ख़ुशबू के लिए आख़िर में एक करी पत्ता या चुटकी भर नमक डालें। थोड़ा ठंडा करके साफ़, सूखे काँच के जार में छान लें।
इस्तेमाल का तरीका
- प्रति व्यक्ति रोज़ 1–2 छोटे चम्मच प्रयोग करें: तड़के में, दाल-चावल या रोटी पर, या खिचड़ी में।
- रात को रूखे होंठों, फटी एड़ियों या खुरदुरी कोहनियों पर थोड़ा लगाएँ।
- बचे हुए भूरे हिस्से (घी की खुरचन) को रोटी के आटे में या चीनी के साथ मीठे के रूप में खाया जा सकता है।
मददगार आदतें
- पानी न जाए तो घी कमरे के तापमान पर महीनों चलता है — हमेशा सूखा चम्मच प्रयोग करें।
- भैंस के दूध की मलाई से ज़्यादा घी निकलता है; गाय का घी ज़्यादा पीला होता है और आयुर्वेद में हल्का माना जाता है।
सावधानियाँ
- दिल की बीमारी, ऊँचा कोलेस्ट्रॉल, मोटापा या फ़ैटी लिवर हो तो घी सीमित रखें और वसा के बारे में डॉक्टर की सलाह मानें।
- सर्दी-जकड़न या भूख न लगने पर घी भारी पड़ता है — ज़ुकाम और अपच के दौरान कम लें।
- आयुर्वेदिक डॉक्टर के मार्गदर्शन के बिना घर पर कान या आँखों में घी न डालें।




